(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.130. अध्यायः 130
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
दुःशलाजननप्रकारकथनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

जनमेजय उवाच। 1-130-0x(774)(5767)
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामादितः कथितं त्वया।
ऋषेः प्रसादात्तु शतं न च कन्या प्रकीर्तिता॥ 1-130-1(5768)
वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च कन्या चैका शताधिका।
गान्धारराजदुहिता शतपुत्रेति चानघ॥ 1-130-2(5769)
उक्ता महर्षिणा तेन व्यासेनामिततेजसा।
कथं त्विदानीं भगवन्कन्यां त्वं तु ब्रवीषि मे॥ 1-130-3(5770)
यदि भागशतं पेशी कृता तेन महर्षिणा।
न प्रजास्यति चेद्भूयः सौबलेयी कथंचन॥ 1-130-4(5771)
कथं तु संभवस्तस्या दुःशलाया वदस्व मे।
यथावदिह विप्रर्षे परं मेऽत्र कुतूहलम्॥ 1-130-5(5772)
वैशम्पायन उवाच। 1-130-6x(775)
साध्वयं प्रश्न उद्दिष्टः पाण्डवेय ब्रवीमि ते।
तां मांसपेशीं भगवान्स्वयमेव महातपाः॥ 1-130-6(5773)
शीताभिरद्भिरासिच्य भागं भागमकल्पयत्।
यो यथा कल्पितो भागस्तंत धात्र्या तथा नृप॥ 1-130-7(5774)
घृतपूर्णेषु कुण्डेषु एकैकं प्राक्षिपत्तदा।
एतस्मिन्नन्तरे साध्वी गान्धारी सुदृढव्रता॥ 1-130-8(5775)
दुहितुः स्नेहसंयोगमनुध्याय वराङ्गना।
`नाब्रवीत्तमृषिं किंचिद्गौरवाच्च यशस्विनी।'
मनसा चिन्तयद्देवी एतत्पुत्रशतं मम॥ 1-130-9(5776)
भविष्यति न संदेहो न ब्रवीत्यन्यथा मुनिः।
ममेयं परमा तुष्टिर्दुहिता मे भवेद्यदि॥ 1-130-10(5777)
एका शताधिका बाला भविष्यति कनीयसी।
ततो दौहित्रजाल्लोकादबाह्योऽसौ पतिर्मम॥ 1-130-11(5778)
अधिका किल नारीणां प्रीतिर्जामातृजा भवेत्।
यदि नाम ममापि स्याद्दुहितैका शताधिका॥ 1-130-12(5779)
कृतकृत्या भवेयं वै पुत्रदौहित्रसंवृता।
यदि सत्यं तपस्तप्तं दत्तं वाऽप्यथवा हुतम्॥ 1-130-13(5780)
गुरवस्तोषिता वापि तथाऽस्तु दुहिता मम।
एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायनः स्वयम्॥ 1-130-14(5781)
व्यभजत्स तदा पेशीं भगवानृषिसत्तमः।
`गण्यमानेषु कुण्डेषु शते पूर्णे महात्मना॥ 1-130-15(5782)
अभवच्चापरं खण्डं वामहस्ते तदा किल।'
गणयित्वा शतं पूर्णमंशानामाह सौबलीम्॥ 1-130-16(5783)
व्यास उवाच। 1-130-17x(776)
पूर्णं पुत्रशतं त्वेतन्न मिथ्या वागुदाहृता।
दैवयोगाच्च भागैकः परिशिष्टः शतात्परः॥ 1-130-17(5784)
एषा ते सुभगा कन्या भविष्यति यतेप्सिता। 1-130-18(5785)
वैशम्पायन उवाच।
ततोऽन्यं घृतकुम्भं च समानाय्य महातपाः॥ 1-130-18x(777)
तं चापि प्राक्षिपत्तत्र कन्याभागं तपोधनः।
`संभूता चैव कालेन सर्वेषां च यवीयसी॥ 1-130-19(5786)
ऐतत्ते कथितं राजन्दुःशलाजन्म भारत।
ब्रूहि राजेन्द्र किं भूयो वर्तयिष्यामि तेऽनघ॥ ॥ 1-130-20(5787)

इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 130 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-130-4 न प्रजास्यति प्रजामात्मनो नेच्छति॥ त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 130 ॥


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